





परन्तु सांसारिक जीवन में वृद्धि के साथ ही संतान अपने आस-पास के वातावरण व संगत् के आवरण में अपने देव गुणों को भूलता चला जाता है। यदि पूर्व संस्कार बहुत अच्छे हैं, तभी संतान देव वृत्तियों की वृद्धि कर पाता है, अन्यथा राक्षसी वृत्तियां उस पर हावी होने लगती है, फलस्वरूप संतान अपने जीवन की प्रारम्भिक आयु में ही माया के वशीभूत होकर अपने देवत्व का विस्मरण कर देती है।
व्यक्ति अपने चित्तवृत्तियों का किस प्रकार से उपयोग करता है वह उसके स्वयं पर निर्भर करता है। वर्तमान समय में पाश्चात्य संस्कृति के आवेश में बच्चे नकारात्मक गुणों व स्वभाव को शीघ्रता से अपना रहे हैं। संतान अपनी दुष्ट प्रकृति के कारण कुसंस्कारों की ओर प्रवृत हो जाता है, वह देवत्व धारण न कर राक्षस प्रवृति धारण कर लेता है। इसी कारणवश उसमें झूठ, छल, कपट, हिंसा, व्याभिचार इत्यादि कुसंस्कार आ जाते हैं। परिणाम स्वरूप असफलता, कार्य-रोजगार बाधा, व्यापार बंधन, शत्रु बाधा, धन अभाव जैसी विषम कुस्थितियों से ग्रस्त रहता है।
ऐसे में देवत्व आवाहन के सहयोग से व्यक्ति में देवतत्व को पुनः जाग्रत किया जा सकता है। अतः सद्गुरूदेव द्वारा ही इस विशिष्ट क्रिया को सम्पन्न किया जा सकता है। जब व्यक्ति में देव गुण जाग्रत हो जाते हैं, तो फिर उसे याचना नहीं करनी पड़ती, फिर धन, सम्पदा, ऐश्वर्य, कीर्ति, ज्ञान, आनन्द, प्रेम, वात्सल्य, सकल पदार्थ उसे उपलब्ध होते हैं, क्योंकि समस्त देवताओं की कृपा नहीं अपितु सहयोग उसे प्राप्त हो जाता है। फिर देवता उसके आराध्य नहीं रहते, वे तो उसके मित्रवत् हो जाते हैं।
जब यह दीक्षा आपकी संतान को प्राप्त हो जाती है, तो फिर उसमें कोई सामान्य व्यक्तित्व रह ही नहीं सकता, उसके अन्दर राम, बुद्ध, कृष्ण, इन्द्र, कुबेर, गणेश, देवताओं के गुण स्वतः ही फूलने-फलने लगते हैं और उनमें सुसंस्कारों की वृद्धि होती है।
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