





शिव उपासना का एक बहुत व्यापक रूप है, तथापि भक्त अपनी भावनाओं के अनुसार कृपा पाने के लिए अनेक तरीकों से उनकी पूजा करते हैं। भगवान शिव की पूजा सगुण-साकार-अमर रूप के साथ-साथ निर्गुण-निराकार-अमर रूप में भी की जाती है। भगवान शिव की पूजा परम शिव, सांबासदाशिव, उमा-महेश्वर, अर्धनारीश्वर, मृत्युंजय, पंचवक्त्र, पशुपति, कृत्तिवासा, दक्षिणामूर्ति, योगीश्वर, महादेव और महेश्वर के रूप में की जाती है। इसके अतिरिक्त ईशान, तत्पुरुष, अघोर, वामदेव तथा सद्योजात- ये भगवान शिव की पांच प्रतिमाएं हैं, पंचवक्त्र पूजा इन्हीं नामों से की जाती है। शर्व, भव, रुद्र, उग्र, भीम, पशुपति, ईशान और महादेव- ये क्रमशः पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, क्षेत्रज्ञ, सूर्य और चंद्रमा में स्थित रहने वाली प्रतिमाएं हैं। उनकी पूजा एकरुद्र, एकादश रुद्र तथा असंख्य रुद्रों के रूप में की जाती है। हृदय देश में उनका ध्यान निर्गुण-निराकार के रूप में किया जाता है। लिंगो पूजा व्यापक रूप से प्रचलित है।
इन विविध शिवोपासनाओं का अनुष्ठान श्रावण मास में विशेष फलदायी तथा भगवान शंकर को प्रीति प्रदान करने वाला होता है। ऐसे ही शिव महिमा परक शिव पुराण आदि के पारायण आदि का श्रावण मास में विशेष माहात्म्य है।
श्रावण में सोमवार का व्रत, प्रदोष व्रत तथा शिव पार्थिव पूजन परम कल्याणकारी है। सोमवार को यदि प्रदोष पड़ जाय तो वह विशेष फलदायक होता है। व्रत के दिन भगवान शंकर का षोडशोपचार अथवा पंचोपचार पूजन पंचाक्षर मंत्र का जप, स्तोत्र-पाठ, अभिषेक आदि विशेष रूप से करना चाहिये। यह सायं काल प्रदोष काल में करना विशेष महत्त्वपूर्ण है। दिन भर व्रत रहकर पूजनोपरान्त रात्रि में एक बार भोजन करें।
भगवान शिव के पंचाक्षर मंत्र 'नमः शिवाय' का जाप विशेष रूप से श्रावण मास में किया जाना चाहिए। ओंकार के साथ संयुक्त होने पर इसे षडक्षर कहा जाता है।
श्रावण मास में लघुरूद्र, महारूद्र तथा अतिरूद्र पाठ कराने का भी विधान है। यजुर्वेदान्तर्गत रूद्राष्टाध्यायी का इसमें विशेष रूप से पाठ होता है। यह अनुष्ठान पाठात्मक, अभिषेकात्मक तथा हवनात्मक तीन रूपों में होता है। भगवान शंकर को जलधारा विशेष प्रिय है, अतः श्रावण मास में जो वर्षाऋतु का समय है, भगवान शंकर का अभिषेक तथा बिल्व पत्रों से उनका अर्चन किया जाता है।
श्रावण मास में जैसे सोमवार व्रत की महिमा है। वैसे ही मंगलवार को भी व्रत किया जाता है और उनमें शिवप्रिया भगवती मंगलागौरी का पूजन होता है। विशेष रूप से विवाह के बाद प्रत्येक स्त्री को चार-पांच वर्षों तक यह व्रत करना चाहिये। यह व्रत अखण्ड सौभाग्य तथा पुत्र की प्राप्ति के लिये किया जाता है।
श्रावण मास भगवदाराधना एवं अनुष्ठान का मास है, व्रत-पर्वों का मास है। इस मास में प्रायः प्रत्येक तिथि को कोई-न-कोई व्रत, पर्व, उत्सव एवं त्यौहार हुआ ही करता है।
श्रावण कृष्ण द्वितीया को ‘अशून्यशयनव्रत’ सम्पन्न होता है। इस व्रत से वैधव्य तथा विधुरत्व का परिहार होता है। इसमें उपवास पूर्वक भगवान लक्ष्मी-नारायण की आराधना की जाती है। श्रावण शुक्ल तृतीया के समान ही श्रावण कृष्ण तृतीया भी ‘कज्जली तृतीया’ कहलाती है। इस तिथि को श्रवण नक्षत्र में भगवान विष्णु का पूजन किया जाता है। इसी तिथि को ‘स्वर्णगौरी व्रत’ भी किया जाता है। श्रावण कृष्ण चतुर्थी को ‘संकष्ट चतुर्थी व्रत’ होता है। इसमें भगवान गणेश की आराधना होती है।
श्रावण कृष्ण सप्तमी को ‘शीतला सप्तमी व्रत’ होता है तथा शीतला देवी का पूजन होता है और कथा सुनी जाती है। श्रावण कृष्ण पक्ष की एकादशी ‘कामिका एकादशी’ के नाम से विख्यात है। इसके माहात्मय के विषय में भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को बताया कि इस दिन व्रत करके तुलसी मंजरी से भगवान विष्णु का पूजन करना चाहिये, इससे सभी प्रकार के अभीष्ट प्रयोजनों की सिद्धि होती है।
श्रावण शुक्ल पक्ष पर्वोत्सवों की दृष्टि से विशेष महिमामय है। श्रावण शुक्ल पक्ष तृतीया को ‘तीज’ का मुख्य पर्व होता है।
इसे श्रावणी तीज, हरियाली तीज या कजली तीज भी कहते हैं। यह विशेष रूप से बालिकाओं और नवविवाहिता स्त्रियों का पर्व है। प्रकृति उल्लास के साथ मानव मन का उल्लास जुड़ जाता है। कृषि कर्म का आरम्भ भी होता है। अतः घर-घर इस पर्व का उल्लास छाया रहता है।
श्रावण शुक्ल चतुर्थी को ‘दूर्वागणपति व्रत’ होता है। श्रावण शुक्ल पंचमी ‘नागपंचमी’ के नाम से विख्यात है। लोकाचार या देश भेद से कहीं-कहीं कृष्ण पक्ष में यह पर्व होता है। पंचमी तिथि नागों के आविर्भाव की तिथि है। अतः इस दिन नागों का विशेष रूप से पूजन होता है। इससे नागों से भय नहीं रहता है। विष दोष भी दूर हो जाता है। नाग भगवान शंकर के आभूषण के रूप में प्रतिष्ठित हैं। अतः यह प्रकारान्तर से भगवान शिव के पूजन का ही प्रतीक रूप है।
श्रावण शुक्ल पक्ष की एकादशी ‘पुत्रदा एकादशी’ कहलाती हैं। श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को ‘रक्षा बन्धन’ का पर्वोत्सव मनाया जाता है और इसी तिथि को श्रावणी उपाकर्म होता है। रक्षा बन्धन में पराह्णव्यापिनी तिथि ली जाती है। यदि वह दो दिन हो या दोनों ही दिन न हो तो पूर्वा लेनी चाहिये। यदि उस दिन भद्रा हो तो उसका त्याग कर देना चाहिये।
श्रावण शुक्ल पूर्णिमा उपाकर्म का मुख्य काल है। वेदों का पाठ करने के शुभ कार्य को उपाकर्म कहा जाता है। यह सब बलि अनुष्ठान के बाद ही होता है। इस दिन प्रतिष्ठित नवीन यज्ञ उपवीत धारण किया जाता है। इस दिन, सबसे पहले तीर्थ की पूजा करने के बाद, पंचगव्य प्राशन, प्रायश्चित्त संकल्प और हेमाद्रि स्नान संकल्प के साथ दस प्रकार के स्नान किए जाते हैं। इसके बाद अरुंधति के साथ ऋषि पूजा, सूर्योपस्थान, ऋषि तर्पण, यज्ञ उपवीत पूजा और नया यज्ञ उपवीत धारण करने का अनुष्ठान होता है।
इस प्रकार श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को श्रावण मास पूर्ण होता है। इस मास के कृत्यों के सम्बन्ध में महाभारत में बताया गया है कि श्रावण में पूरे मास पर्यन्त संयम-नियम पूर्वक जो एक भक्त व्रत करता है और प्रतिदिन भगवान शंकर का अभिषेक करता है, वह स्वयं भी पूजनीय हो जाता है तथा कुल की वृद्धि करते हुये उसका यश एवं गौरव बढ़ाने वाला हो जाता है-
जो एक भक्त के साथ एक महीने तक नियमित रूप से श्रावण मास मनाता है।
यहां-वहां सगे-संबंधियों द्वारा उनका अभिषेक कर उनकी पूजा की जाती है।
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